पिता की इज्ज़त शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी आज्ञा मानने में है|
*हमारी प्राथर्नाओं में, विनती निवेदन और आराधना मे और प्रभु के पवित्र वचनों में रिश्ता क्या है? जब हम उसे ऐ हमारे बाप या पिता कहते हैं| तब पवित्र आत्मा भी हमारी आत्मा के साथ मिलकर, प्रभु को अब्बा पिता कहकर पुकारता है|* मलाकी 1.6 में लिखा है ---पुत्र पिता का और दास स्वामी की इज्ज़त करता है, यदि मैं पिता हूं, तो मेरा आदर मानना कहां है? पिता की इज्ज़त शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी आज्ञा मानने में है| *लूका 6.46 में यीशु ने कहा---जब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो मुझे हे प्रभु क्यों कहते हो? यही सवाल हमसे पूछा जाए, तो हमारा जवाब क्या होगा?* नीतिवचन 28.9 में लिखा है ---जो अपना कान व्यवस्था सुनने से फेर लेता है, उसकी प्रार्थना घृणित ठहरती है| *इंसान की फ़ितरत भी अजीब है, वो प्रभु का वचन सुनना नहीं चाहता, मानना नहीं चाहता, मगर ये चाहता है, कि वो जब भी प्राथर्ना करे, प्रभु उसकी सुन ले ! जब हम प्रभु की सुनते हैं, तो वो हमारी सुनता है| हिजकिय्याह कहने लगा, हे यहोवा बिनती करता हूं, स्मरण कर की मैं सच्चाई और खरे मन से, अपने को तेरे सन्मुख जानकार, चलता आया हूं और जो तेरी दृष्टि में उचित था, वो ही करता आया हूं| यशायाह 38.5 में लिखा है ---मैंने तेरी प्रार्थना सुनी और तेरे आंसू देखे हैं, सुन मैं तेरी उम्र पंद्रह वर्ष और बढ़ा देता हूं| वो देखने और सुनने वाला परमेश्वर है
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर
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