मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य ( लाइलाज) रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?
*ज़रूरतों को पूरा करना, कुछ हद तक अच्छा है; परन्तु लालसाओं को पूरा करने के लिए असंतोष रहना अच्छा नही* क्योंकि हज़ारों कमाने वाला लाखों कमाने की दौड़ में लगा हुआ है, जो लखपति है वो करोड़पति बनने की दौड़ में लगा हुआ है, *ये जानते हुए भी कि इंसान को एक दिन यहा से जाना है, उसका शरीर नश्वर है, हम ज़्यादा और भी ज़्यादा की दौड़ में लगे हुए हैं*
सिकन्दर ने दुनिया पर विजय पाई जब गया तो दोनों हाथ खाली थे। जिस पैसे की दौड़ में इंसान सारी ज़िन्दगी लगा देता हैं वो अपनी ज़िन्दगी में एक पल भी नही बड़ा सकता।यही सत्य है।
हमारी तृष्णा का हाल यह है, की हमारा पेट तो भर जाता है, मगर *मन* नहीं भरता क्योंकि इसमें रोग लगा हुआ हैं।
यिर्मयाह 17:9, में लिखा है, *मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य ( लाइलाज) रोग लगा है;* उसका भेद कौन समझ सकता है?
यिर्मयाह 17:10, में, *मैं यहोवा मन की खोजता और हृदय को जांचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसके चाल- चलन के अनुसार अर्थात उसके कामों का फल दूं।*
हालांकि हर इंसान अगर यह समझ ले कि जो उसके पास है, शायद उतना दूसरों के पास नहीं है,तो ऐसा सोचते ही हम दुनिया के सबसे सुखी इंसानो में हो जाएंगे,
परमेश्वर जानते है कि हमारी जरूरते क्या है पर मनुष्य इतना असंतोष से भरा है कि नही जानता कि इसका परिणाम अच्छा नही।
क्यो ना हम इस भयानक दु:ख से बचे और जो कुछ हमारे पास है उसका हर पल धन्यवाद करें।प्रभु का आत्मा इस सत्य को समझ कर चलने में हमारी मदद करें.
आमीन
प्रभु आपको आशीष दे
रैव्ह राजेश गिरधर
Comments
Post a Comment