मनुष्य आत्मा 84 लाख योनियाँ धारण नहीं करती
🌩🌩🌩🌩🌩🌩🌩🌩🌩🌩
🙎🏻♂ *मनुष्य आत्मा 84 लाख योनियाँ धारण नहीं करती*
🟣 *परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें ईश्वरीय ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहस्य समझाये है, वैसे ही यह भी एक नई बात समझाई है की वास्तव में मनुष्यात्माएं पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेती यह हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात है परन्तु फिर भी कई लोग ऐसे लोग है जो यह कहते की मनुष्य आत्माएं पशु-पक्षी इत्यादि 84 लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है*
🟣 *वे कहते है की - “जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दण्ड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बन्द कर देती है और उसे सुख-सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दण्ड के रूप में पशु-पक्षी इत्यादि भोग-योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है”*
🟣 *परन्तु अब परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव ने समझया है की मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दण्ड मनुष्य-योनि में ही भोगती है। परमात्मा कहते है की मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु-पक्षी से अधिक दुःखी भी होता है, परन्तु वह पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नहीं लेता यह तो हम देखते या सुनते भी है की मनुष्य गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है की कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबलरोटी और मक्खन खिलाया जाता है, सोफे (Sofa) पर सुलाया जाता है, मोटर-कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार तथा प्रेम से पाला जाता है, परन्तु ऐसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अद्-र्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसे मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उन्हें अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों की हालत में सड़क की पटरियों पर कुते से भी बुरी मौत मर जाते है और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मार डालते है! अत: जब हम स्पष्ट देखते है की मनुष्य-योनि भी भोगी-योनि है और की मनुष्य-योनि में मनुष्य पशुओं से अधिक दुःखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाए की मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है*❓
🌳 🥭 *जैसा बीज वैसा वृक्ष* 🥭 🌳
🟣 *इसके अतिरिक्त, यह एक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादि काल से अव्यक्त रूप में भरा हुआ है और, इसलिए मनुष्यात्माएं अनादि काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण-कर्म-स्वभाव प्रभाव और प्रारब्ध वाली है! मनुष्यात्माओं के गुण, कर्म, स्वभाव तथा पार्ट (Part) अन्य योनियों की आत्माओं के गुण, कर्म, स्वभाव से अनादिकाल से भिन्न है! अत: जैसे आम की गुठली से मिर्च पैदा नहीं हो सकती बल्कि “जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है”, ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओं की तो श्रेणी ही अलग है मनुष्यात्माएं पशु-पक्षी आदि 84 लाख योनियों में जन्म नहीं लेती बल्कि, मनुष्यात्माएं सारे कल्प में मनुष्य-योनि में ही अधिक-से अधिक 84 जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख-दुःख भोगती है!*
🟢 *यदि मनुष्यात्मा पशु योनि में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढ़ती ना जाती*
🟣 *आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरी कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का पुनर्जन्म पशु-योनि में होता, तब तो हर वर्ष मनुष्य-गणना बढ़ती ना जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारों के कारण विकर्म बन रहे है परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य-गणना बढ़ती ही जाती है, क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट-पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नहीं ले रहे है*
🌩️🌩️🌩️🌩️🌩️🌩️🌩️🌩️🌩️🌩️
Comments
Post a Comment